काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में मनमानी,अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के नाम से,सारे नेताओं की फटी,सारे प्रवचन हुए बन्द

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सेक्युलर क्या,हर जमात का छुटभैये और बड़े नेता ने प्रवचन दिए खूब ज्ञान पेला हिन्दू विश्वविद्यालय के नाम पर,जब समानांतर नियम के बारे में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की बात करनी चाही तो नेताओं,पत्रकारों और ज्ञानियों ने मुंह सिल लिए।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय इन दिनों चर्जा में है. संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति का मामला अभी ठंडा नहीं हो पाया था कि अब एक और विवाद सामने आ रहा है. बीएचयू के इतिहास विभाग ने बीए न्यू समेस्टर से रामायण (Ramayana) और महाभारत (Mahbharta) के साथ वैदिक काल का अध्याय हटा दिया है. रामायण और महाभारत अध्याय को हटाए जाने से छात्रों (Students) में आक्रोश देखने को मिल रहा है. छात्रों ने सेमेस्टर से महाभारत और रामायण को हटाए जाने को लेकर विभागध्यक्ष के सामने अप्पत्ति दर्ज कराई है.
बता दें कि पिछले 13 दिनों से बीएचयू के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में ताला बंद है. छात्र विभाग में मुस्लिम असिस्टेंट प्रोफ़ेसर की नियुक्ति का विरोध कर रहे हैं. दूसरी ओर अब तक विश्वविद्यालय प्रशासन इस मुद्दे को लेकर किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच सका है.आंदोलित छात्र लगातार 13 दिनों से धरना दे रहे हैं उनकी मांग है कि फिरोज खान को हटाया जाए.
जानें पूरा मामला
छात्रों का आंदोलन अभी भी उग्र है. वे धरने पर बैठे हैं और किसी भी कीमत पर संस्कृत के धर्म विज्ञान विभाग में मुस्लिम शिक्षक की नियुक्ति ना होने देने की ठान ली है. इस आंदोलन में इस विभाग के मौजूदा छात्र-छात्राओं के अलावा विश्वविद्यालय के अन्य विभागों के भी छात्र-छात्राएं शामिल हैं. इतना ही नहीं पूर्व छात्र भी इस आंदोलन में भाग ले रहे हैं. विश्वविद्यालय के संस्कृत के धर्म विज्ञान के पूर्व छात्र मुनीष मिश्रा बताते हैं, ”विश्वविद्यालय के किसी भी संकाय में किसी भी धर्म के लोग पढ़ा सकते हैं, यहां तक की संस्कृत के साहित्य विभाग में भी किसी भी धर्म के शिक्षक की नियुक्ति हो सकती है लेकिन हमारा आंदोलन केवल संस्कृत के धर्म विज्ञान में मुस्लिम शिक्षक की नियुक्ति के खिलाफ हैं.
गैर हिन्दू की नियुक्ति बीएचयू एक्ट के खिलाफ
पूर्व छात्र बताते हैं कि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय एक्ट और इस संकाय के बाहर लिखे शिलालेख में मदन मोहन मालवीय ने साफ कहा है कि इस महाविद्यालय में विद्यार्थियों का प्रवेश वर्णाश्रम के नियमानुसार किया जाएगा. मुनीष मिश्रा यहीं नहीं रुकते वे कहते हैं, बीएचयू के परिसर में विश्वनाथ का भव्य मंदिर बना है. ऐसे में कैसे कोई मुस्लिम खासतौर धर्म विज्ञान की कक्षा में पढ़ाने के लिए जा सकता है. धर्म विज्ञान को पढ़ते हुए खान-पान में भी शुद्धता बरतने के लिए कहा जाता है, लेकिन अगर शिक्षक मुस्लिम होगा तो वह क्या मांस-मछली नहीं खाएगा? अगर वह खाएगा तो फिर क्या ‘धर्म विज्ञान’ पढ़ाने योग्य वह है ?
इसमें हिंदू जीवन पद्धति का भी निर्वाह होता, कितने मुस्लिम तैयार
वहीं इसे मामले पर छात्र नेता शुभम तिवारी का कहना है कि संस्कृत भाषा एवं कविताओं के विकास में मुसलमानों व ईसाइयों का बहुत बड़ा योगदान रहा है जिसके लिए हम कृतज्ञ हैं. इसी परम्परा में डाॅ. फिरोज खान जी ने भी संस्कृत का अध्ययन किया जो अभिनन्दनीय है, लेकिन संस्कृत विद्याधर्म विज्ञान संकाय में संस्कृत भाषा एवं कविता के अतिरिक्त सनातन हिन्दू जीवन पद्धति, सनातन धर्म परम्परा का भी निर्वाह किया जाता है इसमें कितने मुसलमान एवं ईसाई अपना योगदान देंगे कृपया यह भी बताएं.
एमयू में कितने हिन्दू शिक्षक बने
शुभम कहते हैं कि अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का सबसे पुराना एक संकाय है जिसका नाम Faculty of Theology है और उसके दो विभाग हैं जो शिया एवं सुन्नीसमुदाय के लिए हैं. अगर आप उसकी वेबसाइट पर जाएं तो कुछ विशिष्ट पुरातन छात्रों के नाम देखें तो ढूंढते रह जाएंगे लेकिन एक भी हिन्दू नहीं मिलेगा. उसके बाद आया डिपार्टमेण्ट ऑफ थियोलाॅजी में जिसके मुख्यपृष्ठ पर ही अंग्रेजी में कुछ इस तरह लिखा है- यह संकाय न केवल सबसे पुराना है, बल्कि कई मायनों में अद्वितीय है. यह भारतीय विश्वविद्यालयों में एकमात्र संकाय है जहां सुन्नी और शिया धर्मशास्त्र पढ़ाए जाते हैं और स्नातक, स्नातकोत्तर और डॉक्टरेट की उपाधियाँ प्रदान की जाती हैं. “ये दोनों विभाग न केवल शिक्षण और अनुसंधान सुविधाएं प्रदान करते हैं बल्कि परिसर के धार्मिक जीवन का प्रबंधन भी करते हैं. दोनों सुन्नी-शिया एकता के प्रतीक हैं और मुस्लिम एकता और भाईचारे के सर सैयद के दृष्टिकोण का एक जीवंत प्रकटीकरण हैं.”
AMU में कोई हिन्दू टीचर नहीं तो क्या कोई हिन्दू उर्दू नहीं जानता ?
छात्र नेता कहते हैं कि यह रहा उस संकाय का ध्येय वाक्य उसके बाद दोनों शिया एवं सुन्नी विभागों के टीचिंग एवं नाॅन टीचिंग स्टाफ की लिस्ट देखिए जिसमें मुझे एक भी हिन्दू नाम नहीं दिखेगा. तो कुल मिलाकर निष्कर्ष यह निकलता है कि हिन्दुस्तान में कोई ऐसा हिन्दू नहीं है जिसे ऊर्दू ज़बान आती हो और वह मुस्लिम थियोलाॅजी को अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में जाकर पढा सके. उन्होने कहा कि ऐसे ही दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी की ऑफिशियल साइट पे जाइए तो यहां भी एक संकाय है जिसका नाम है Humanities and language center इसमें कई भाषाओं के विभिन्न विभाग हैं जिसमें Dipartment of Urdu Dipartment of Arabic, Dipartment of islamic studies इन तीनों विभागों में मुझे एक भी हिन्दू नाम नहीं दिखा. अब इसे हम क्या समझें आप ही बताएं.
लोग संस्कृत धर्म विज्ञान संकाय को संस्कृत साहित्य विभाग समझ रहे
शुभम तिवारी कहते हैं फिरोज खान हमें संस्कृत भाषा पढ़ाएं हमें कोई दिक्कत नहीं. संस्कृत के साहित्य विभाग में भी किसी भी धर्म के शिक्षक की नियुक्ति हो सकती है लेकिन संस्कृत धर्म विज्ञान संकाय का शिक्षक कोई गैर हिंदू नहीं हो सकता है. फिरोज खान साहब को संस्कृतविद्या धर्मविज्ञान संकाय में छोड़कर भारत में सैकड़ों संस्कृत विभाग एवं संस्थान हैं कहीं भी नियुक्त कर दीजिए हमें कोई आपत्ति नहीं है. मीडिया प्रमुख का कहना है कि हमारे प्रदर्शन को बहुत लोग गलत समझते हैं क्योकि बाकी विश्वविद्यलयों में केवल संस्कृत साहित्य विभाग ही है वहीं बीएचयू में इसके अलावा संस्कृत धर्म विज्ञान संकाय भी है जिसका शिक्षक खान साहब को बनाया गया है. इसमें धर्म-कर्मकांड, वेद-पुराण की शिक्षा दी जाती है, जो कि एक सनातनी ही दे सकता है.
बता दें कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी में स्थित एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय है. इसे प्रायः बीएचयू (बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी) कहा जाता है. इस विश्वविद्यालय की स्थापना महामना पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा सन् 1916 में बसंत पंचमी के दिन की गई थी. करीब 1300 एकड़ में बनी बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के मुख्य परिसर में 6 संस्थान, 14 संकाय और लगभग 140 विभाग है. 75 छात्रावासों के साथ यह एशिया का सबसे बड़ा आवासीय विश्वविद्यालय है जिसमें तीस हजार से ज्यादा छात्र अध्ययनरत हैं जिनमें लगभग 34 देशों से आये हुए छात्र भी शामिल हैं.
बीएचयू के उद्देश्य
अखिल जगत की सर्वसाधारण जनता के, एवं मुख्यतः हिन्दुओं के, लाभार्थ हिन्दूशास्त्र तथा संस्कृत साहित्य की शिक्षा का प्रसार करने, जिससे प्राचीन भारत की संस्कृति और उसके उत्तम विचारों की रक्षा हो सके, तथा प्राचीन भारत की सभ्यता में जो कुछ महान तथा गौरवपूर्ण था, उसका निदर्शन हो ऐसे उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए बीएचयू को स्थापित किया गया था.