चीन को नवम्बर में ही पता था ,दुनिया भर जाएगी लाशों से,जारी रखा मौत का तमाशा8

67
सार्स, Covid-19, नोवेल कोरोना वायरस, आदि शब्द आम जनता के लिए नए हो सकते हैं, लेकिन विज्ञान के क्षेत्र से जुड़े और विज्ञान में दिलचस्पी रखने वाले लोग जानते हैं कि कोरोना वायरस कोई नया शब्द नहीं है। वर्ष 2002 से 2003 के बीच जिस तरह से सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिन्ड्रोम (सार्स, SARS) ने तबाही मचाई थी, उससे कहीं ज्यादा बड़ी महामारी बनकर अब नोवेल कोरोना वायरस उभरकर सामने आया है।
16-17 मई 2003 को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) SARS की महामारी पर पहली ग्लोबल बैठक का जिनेवा, स्विट्जरलैंड में आयोजन किया। इस बैठक के 2 प्रमुख उद्देश्य थे:
  • 1- इस वायरस द्वारा जनित महामारी पर तत्कालीन सेन्सस डॉक्यूमेंट तैयार करना।
  • 2- अतिरिक्त किसी महामारी पर शोध की प्लानिंग और जानकारी में मौजूद खामियों को तलाशना।
एक अध्ययन में बताया गया है कि अभी तक मौजूद जानकारी के अनुसार इस वायरस की एक बड़ी फैमिली है, जिसमें से केवल छह वायरस ही इंसान को संक्रमित कर सकते हैं। माना जा रहा है कि इंसानों में बीमारी फैलाने वाला कोरोना वायरस इस फैमिली का सातवाँ सदस्य है। SARS-CoV, MERS-CoV and SARS-CoV-2 गंभीर रोग पैदा कर सकते हैं, जबकि HKU1, NL63, OC43 और 229E में हल्के लक्षण देखे जा सकते हैं।
इसमें बताया गया है कि कुछ देशों के दावों के विपरीत SARS-CoV-2 को किसी प्रयोगशाला में नहीं बनाया जा सकता है, ना ही इसे किसी जैविक युद्ध के उद्देश्य से तैयार किया जा सकता है और यह हर हाल में एक पशुजन्य रोग ही है। SARS-CoV-2 बीटा CoVs केटेगरी से सम्बंधित है और अन्य CoVs की तरह ही, यह अल्ट्रावायलेट किरणों और गर्मी के प्रति संवेदनशील है।
वैज्ञानिकों ने पाया कि SARS-CoV-2 स्पाइक प्रोटीन का RBD हिस्सा मानव कोशिकाओं के उस बाहरी हिस्से के मोलिक्युलर ढाँचे को प्रभावित करने के लिए विकसित हुआ था, जिसे ACE2 कहा जाता है। यह रक्त प्रेशर को नियंत्रित करने में सहयोगी एक रिसेप्टर है। SARS-CoV-2 स्पाइक प्रोटीन मानव कोशिकाओं को बाँधने में इतना प्रभावी था कि वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला कि यह प्राकृतिक चयन का परिणाम था, न कि किसी आनुवांशिक इंजीनियरिंग का।
क्योंकि CoVID-19 बीमारी के पहले मामलों को वुहान के हुआनन सीफूड होलसेल मार्केट के सीधे संपर्क से जोड़ा गया था, इसलिए पशु-से-मानव संचरण को इसके संक्रमण का प्रमुख तंत्र माना गया था। फिर भी, बाद के मामले इस प्रकार के संचरण तंत्र से जुड़े नहीं थे। इसलिए, यह निष्कर्ष निकाला गया कि वायरस को मानव-से-मानव में भी प्रेषित किया जा सकता है, और कोरोना वायरस से संक्रमित लोग ही COVID-19 के प्रसार का सबसे बड़ा स्रोत हैं।
ह्यूमन कोरोना वायरस (HCoV) की पहचान पहली बार 1960 के दशक में हुई थी। 2003 के बाद पाँच नए प्रकार के मानव कोरोना वायरस खोजे जा चुके हैं। किन्तु 2003 के बाद से चीन से SARS का प्रसार आरम्भ हुआ। इस SARS वायरस फैमिली का पुराने किसी प्रकार के कोरोना वायरस से सम्बन्ध नहीं था, जिस कारण इसे तीसरा कोरोना परिवार माना गया। 2002-03 में कुल 8,098 लोग SARS कोरोना वायरस से संक्रमित हुए, जिनमें से 774 लोग संक्रमण के कारण मारे गए। उसके कारणों की पूरी जाँच आज तक भी नहीं हो सकी किन्तु चीन के जंगली पशुओं के मांस के व्यापार से उसका सम्बन्ध जरूर स्थापित हो चुका है। वर्तमान में जो महामारी पूरे विश्व में फैली है, वह बिल्कुल नए प्रकार का कोरोना वायरस है जिसका प्रचलित नाम COVID-19 है।
हॉर्सशू चमगादड़ से मानव तक SARC वायरस के संक्रमण का सफर
एक अन्य अध्ययन में बताया गया है कि ये नया कोरोना वायरस चीनी हॉर्सशू चमगादड़ में मिलने वाले वायरस से मिलता जुलता है। हालाँकि, इस पर अभी तक भी आखिरी राय नहीं बन पाई है कि आज जिस स्थिति से चीन के बाद पूरा विश्व जूझ रहा है, उसके लिए यही चमगादड़ ज़िम्मेदार है। लेकिन यह सम्भव है कि इन चमगादड़ों के शरीर से वायरस दूसरे जानवर के शरीर में आया हो।
सबसे पहले जब इस वायरस के संक्रमण की ख़बर मिली तो वैज्ञानिकों का कहना था कि ये इंसानों से इंसानों में नहीं फैलता लेकिन बाद में पता चला है कि इस वायरस से संक्रमित एक व्यक्ति 1.4 से लेकर 2.5 लोगों को संक्रमित कर सकता है। यही वजह है कि जब तक शोधकर्ता किसी निर्णय तक पहुँचते कि शहरों को पूरी तरह ठप कर के ही इसके संक्रमण को रोका जा सकता है। तब तक यह कई देशों में फैल चुका था।
1 दिसम्बर 2017 को नेचर में प्रकाशित एक लेख में बताया गया है कि चीन भर में चलाए गए खोजी अभियान के बाद, आखिरकार घातक सार्स वायरस की उत्पत्ति को ढूँढ लिया था। चीन के युन्नान प्रांत की एक दूरस्थ गुफा में, विषाणु विज्ञानियों ने ‘हॉर्सशू चमगादड़ों’ की एक एकल आबादी की पहचान की, जिसने कि वर्ष 2002 में मनुष्यों में भी पैर पसार लिए थे और तकरीबन 800 लोगों की मौत का कारण बना। शोधकर्ताओं ने कहा था कि मौत के लिए जिम्मेदार यह वायरस आसानी से चमगादड़ों की ऐसी आबादी से ही आया होगा।
उन्होंने आगाह किया था कि ऐसी ही कोई बिमारी भविष्य में भी जन्म ले सकती है। 2002 के उत्तरार्ध में, एक रहस्यमयी निमोनिया जैसी बीमारी के मामले दक्षिण-पूर्वी चीन के गुआंगडोंग प्रांत में सामने आने लगे। इस बीमारी को SARS नाम दिया गया, जिसने उस समय भी वैश्विक आपातकाल को जन्म दिया। वर्ष 2003 में यह देखते ही देखते दुनिया भर में फैल गया, जिससे हजारों लोग संक्रमित हुए।
वैज्ञानिकों ने इसके लिए जिम्मेदार कोरोना वायरस को ढूँढ निकाला और उसी के जैसे जैनेटिकली सामान वायरस गुआंगडोंग प्रांत के पशु बाजार में बिकने वाले उदबिलाव (Paguma larvata) में भी पाया। कोरोना वायरस के वाहक की तलाश वैज्ञानिक निरंतर करते आए हैं, इस बार कोरोना वायरस के मानव तक संक्रमण के लिए पेंगोलिनो को जिम्मेदार बताया जा रहा है। कुछ चीनी वैज्ञानिकों ने करीब हजार जानवरों पर परीक्षण करके इस निष्कर्ष तक पहुँचें थे।
दुनिया भर के जानवरों को खाने के लिए बेचने की सबसे बड़ी मंडी है वुहान के पास,122 तरह के पशु पक्षियों की बिक्री होती है यहां,यहां से पैदा हुआ वायरस आज दुनिया मे मौत बना घूम रहा है
जनवरी 2019, इंस्टिट्यूट ऑफ वायरलॉजी नेशनल बायोसेफ्टी लैब. वुहान, चीन
चीन की वुहान लैब में इबोला, निपाह, सॉर्स और दूसरे घातक वायरसों पर रिसर्च कर रहे वैज्ञानिक अपने माइक्रोस्कोप में एक अजीब सा वायरस नोटिस कर रहे थे. मेडिकल हिस्ट्री में ऐसा वायरस पहले कभी नहीं देखा गया था. इसके जेनेटिक सीक्वेंस को गौर से देखने पर पता चल रहा था कि ये चमगादड़ के करीबी हो सकते हैं. वैज्ञानिक हैरान थे क्योंकि इस वायरस में वो सार्स वायरस के साथ समानता को देख पा रहे थे. जिसने 2002-2003 में चीन में महामारी ला दी थी और दुनिया भर में 700 से ज़्यादा लोग मारे गए थे. उस वक्त भी ये बताया गया था कि सार्स छूने और संक्रमित व्यक्ति के छींकने या खांसने से फैलता है. लेकिन तब चीन इस वायरस को छुपा ले गया था.
दिसंबर का पहला हफ्ता 2019, वुहान, चीन
दिसंबर के शुरुआती हफ्ते में वुहान की सी-फूड मार्केट के ईर्द-गिर्द रहने वाले कई लोग बुखार से पीड़ित होने शुरू हो गए. इनके टेस्ट के लिए सैंपल लैब में भेजे गए. जिसके बाद ये सैंपल वुहान इंस्टिट्यूट ऑफ वायरलॉजी नेशनल बायोसेफ्टी लैब के पास पहुंचे. यहां वैज्ञानिक के माइक्रोस्कोप जो उन्हें दिखा रहे थे. वो आने वाले जानलेवा ग्लोबल खतरे का संकेत था. मगर चीनी अधिकारियों ने डॉक्टरों और वैज्ञानिकों को बदनामी और अफरातफरी के माहौल से बचने के लिए खामोश करा दिया.
ये ज़रूर पढ़ेंः भारत कोरोना का अगला बड़ा केंद्र, 1 महीने में 15 गुना बढ़ेंगे मरीज!
दिसंबर का आखिरी हफ्ता 2019, वुहान, चीन
डॉ. ली वेनलियांग के अस्पताल में स्थानीय सी-फूड मार्केट से करीब सात मरीज़ पहुंचे. ये वही डॉ ली वेनलियांग थे, जिन्होंने दुनिया को पहली बार इस जानलेवा वायरस से आगाह कराया था. बहरहाल इन मरीज़ों के लक्षण देखकर ही डॉ ली को समझ में आ गया कि ये सभी के सभी किसी अनजान घातक वायरस के शिकार हो गए हैं. उन्होंने फौरन इस बीमारी के बारे में दूसरे डॉक्टरों को अलर्ट किया. और इस वायरस के बारे में अपनी रिपोर्ट दी. इतना ही नहीं इस बारे में उन्होंने वीचैट ऐप पर अपने मेडिकल कॉलेज के एलुमनी ग्रुप में भी जानकारी दी. और सबको अपने जानकारों, दोस्तों और रिश्तेदारों को इस बारे में आगाह करने को कहा लेकिन कुछ ही घंटों में उनके मैसज का स्क्रीनशॉट वायरल हो गया.
जनवरी का पहला हफ्ता 2020, वुहान, चीन
नए साल के जश्न में दुनिया और चीन डूबे थे. और ठीक उनकी नाक के नीचे ये वायरस लगातार फैलता जा रहा था. 7 से 14, 14 से 21, 21 से 42 होते. ये तादाद हज़ार तक जा पहुंच गई. मगर चीन इस पर रोकथाम के बजाए. इस जानलेवा बीमारी को दुनिया से छुपाने में ही लगा रहा.
25 जनवरी 2020, इंस्टिट्यूट ऑफ वायरलॉजी नेशनल बायोसेफ्टी लैब, वुहान, चीन
अंग्रेज़ी नए साल के बाद आया चीनी नया साल. अफरातफरी से बचने के लिए चीन ने इस जानलेवा वायरस की खबर को सामने तो नहीं आने दिया. मगर अंदर ही अंदर वुहान के इंस्टिट्यूट ऑफ वायरलॉजी नेशनल बायोसेफ्टी लैब में इसकी जांच चलने लगी. यूं भी इस लैब में पिछले कई सालों से चमगादड़ों से फैलने वाली बीमारियों पर रिसर्च चल रही थी. ये रिसर्च इसलिए थी क्योंकि ना सिर्फ वुहान और आसपास के इलाकों में चमगादड़ों की तादाद ज़्यादा है. बल्कि यहां चमगादड़ों और दूसरे तमाम जानवरों का मांस खाने और सूप पीने का चलन भी ज़ोरों पर था. और अब तक की जांच में ये तो साफ हो रहा था कि हो ना हो ये जानलेवा वायरस इन्हीं चमगादड़ों से ही फैला है. चाइनीज सेंटर फॉर डिज़ीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेशन की स्टडी के डेटा भी इसी तरफ इशारा कर रहे थे.
Must Read: एक कोरोना मरीज की बर्थ-डे पार्टी और दिल्ली-NCR पहुंचा खौफनाक वायरस
फरवरी का पहला हफ्ता 2020, वुहान, चीन
डॉ. ली वेनलियांग इस बीच लगातार अपने डॉक्टर साथियों और लोगों को इस जानलेवा वायरस से ना सिर्फ आगाह कर रहे थे. बल्कि पीड़ितों को आइसोलेशन वार्ड में रखकर अपने तौर पर इलाज भी कर रहे थे. इस बीच ये खबरें चीन से निकलकर दुनिया तक पहुंचने लगी. चीन ने भी अब तक मान लिया कि उसके मुल्क को कोरोना नाम की एक महामारी ने जकड़ लिया है. वहीं दूसरी तरफ चीनी सरकार ने 34 साल के डॉक्टर ली के वायरल हो चुके कोरोना वायरस से आगाह करने वाले मैसेज का संज्ञान लेते हुए. नोटिस भेजकर जवाब मांगा. मगर डाक्टर ली की परेशानियां यहीं खत्म नहीं हुईं. इसके फौरन बाद उनपर अफवाह फैलाने का आरोप लगा दिया गया और उन्हें लिखित में मांफी मांगनी पड़ी. इस बीच वुहान और आसपास के इलाकों के साथ साथ पूरा चीन इस जानलेवा वायरस की चपेट में आ चुका था. और उससे होने वाली मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा था.
7 फरवरी 2020, वुहान, चीन
अचानक खबर आई की कोरोना वायरस के बारे में सबसे पहले जानकारी देने वाले डॉक्टर ली की मौत हो गई है. बताया गया कि डॉक्टर ली 12 जनवरी से अस्पताल में भर्ती थे. और 30 जनवरी को पता चला कि वो कोरोना वायरस की चपेट में आ चुके हैं. चीन ने कहा कि उन्हें बचाने की कोशिश हुई. लेकिन बचाया नहीं जा सका. वुहान सेंट्रल हॉस्पिटल ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि डॉ ली की मौत 7 फरवरी की. रात करीब 2 बजकर 58 मिनट पर हुई. बताया गया कि उन्हें कफ और बुखार था. हालांकि सरकार विरोधी गुटों का ये मानना था कि चीन ने उन्हें इस महामारी का खुलासा करने की सज़ा दी है.
मरीजों को मारने की अर्जी!
ये खबर इसलिए भी हावी हुई क्योंकि शुरुआत में चीन के 20 हज़ार कोरोना पीड़ितों को मार देने के लिए सुप्रीम पीपुल्स कोर्ट में अर्जी देने वाली खबर भी आई थी. मगर ये दोनों ही खबरें कंफर्म नहीं हो सकी. लेकिन चीन में जो कंफर्म हुआ. वो था दुनिया में अबतक का सबसे जानलेवा वायरस के सामने आने का सच. जो अब तक देखते देखते ही हज़ारों लोगों को अपनी चपेट में लेकर बेमौत मार चुका था.
चीन की लापरवाही से फैला कोरोना
डॉ. ली वेनलियांग जिन्होंने दुनिया को सबसे पहले कोरोना वायरस से आगाह किया था खुद उनकी मौत हो गई. ये मौत कोरोना वायरस से ही हुई य़ा फिर चीन की सरकार ने उन्हें ये राज दुनिया के सामने फाश करने की सजा दी ये फिलहाल सवाल ही बना हुआ है. सवाल ये भी बना हुआ है कि कोरोना चमगादड़ से फैला या चीन की लैब से? खुद चीनी वैज्ञानिक इस बात का दावा कर रहे हैं कि ये जानलेवा वायरस किसी जानवर से नहीं बल्कि चीन की लापरवाही से फैला है.
दिसंबर 10, 2019 को ही चीन में कोरोना का पहला मरीज बीमार पड़ने लगा था। इसके एक दिन बाद वुहान के अधिकारियों को बताया गया कि एक नया कोरोना वायरस आया है, जो लोगों को बीमार कर दे रहा है। वुहान सेन्ट्रल हॉस्पिटल के डायरेक्टर ने 30 दिसंबर को इस वायरस के बारे में वीचैट पर सूचना दी। उन्हें जम कर फटकार लगाई गई और आदेश दिया गया कि वो इस वायरस के बारे में किसी को कुछ भी सूचना न दें। इसी तरह डॉक्टर ली वेलिआंग ने भी इस बारे में सोशल मीडिया पर विचार साझा किए। उन्हें भी फटकार लगाई गई और बुला कर पूछताछ की गई। इसी दिन वुहान हेल्थ कमीशन ने एक ‘अजीब प्रकार के न्यूमोनिया’ के होने की जानकारी दी और ऐसे किसी भी मामले को सूचित करने को कहा।
इसके बाद 2020 के शुरूआती हफ्ते में 2 जनवरी को ही चीन के सूत्रों और वैज्ञानिकों ने इस कोरोना वायरस के जेनेटिक इनफार्मेशन के बारे में सब कुछ पता कर लिया था लेकिन इसे सार्वजनिक नहीं किया गया। एक सप्ताह तक इसे यूँ ही अटका कर रखा गया। जनवरी 11-17 तक वुहान में हेल्थ सेक्टर के अधिकारियों की बैठकें चलती रहीं। जनवरी 18 को नए साल के जश्न के दौरान हज़ारों-लाखों लोगों ने जुट कर सेलिब्रेट किया। इसके एक दिन बाद बीजिंग से विशेषज्ञों को वुहान भेजा गया। जनवरी 20 को दक्षिण कोरिया में कोरोना वायरस का पहला मामला सामने आया और उसी दिन चीन ने घोषणा की कि ये ह्यूमन टू ह्यूमन ट्रांसफर होने वाला वायरस है।
जनवरी 21 को चीन के सरकारी अख़बार ने इस बीमारी को लेकर राष्ट्रपति शी जिनपिंग के एक्शन प्लान के बारे में बताया। इसके 2 दिन बाद वुहान के कुछ शहरों में लॉकडाउन की घोषणा की गई। लेकिन, इन सबके बावजूद 24-30 जनवरी तक चीन में नए साल का जश्न मनाया गया, लोगों ने अपने सम्बन्धियों के यहाँ यात्राएँ की और सारे सेलिब्रेशन ऐसे ही चलते रहे। इसी बीच चीन लॉकडाउन का क्षेत्र भी बढ़ाता रहा और वुहान में इस वायरस से लड़ने के लिए एक नया अस्पताल तैयार किया गया। अब वही चीन ये दावे कर रहा है कि उसने इस आपदा को नियंत्रित कर के एक उदाहरण पेश किया है। वही चीन जो महीनों तक दुनिया की आँखों में धूल झोंकता रहा।
चीन की इस करनी से न सिर्फ़ उसे नुकसान हुआ बल्कि आज 100 से ज्यादा देश हलकान हैं। सेलिब्रेशनों की अनुमति देकर और जश्न पर रोक न लगा कर उसने लोगों की आवाजाही जारी रखी, जिससे इस वायरस के फैलने की रफ़्तार बढ़ गई। अगर सही समय पर इस पर लगाम लगाया गया होता तो आज पूरी दुनिया में तबाही का ये आलम नहीं देख रहे होते हम। इसके बावजूद कुछ लोग इस बात पर आपत्ति जता रहे हैं कि इसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ‘चाइनीज वायरस’ क्यों कहते हैं? ये वुहान से ऑरिजिनेट हुआ लेकिन WHO जानबूझ कर इसके नामकरण में वुहान या चीन जैसे शब्द नहीं लाया।
चीन का पुराना इतिहास: हमेशा से चीजों को ढकने में माहिर
चीन का ये सब करने का पुराना इतिहास रहा है। उसने 2003 में SARS वायरस (Severe acute respiratory syndrome) के सामने आने के बाद भी कुछ ऐसा ही किया था। अबकी कोरोना वायरस के सामने आने के बाद भी चीन ने एक्शन लिए लेकिन वायरस को रोकने के लिए नहीं बल्कि इसकी सूचना सार्वजनिक करने वालों के ख़िलाफ़। वायरस के सामने आने के 7 सप्ताह बाद कुछ शहरों को लॉकडाउन करना और इस वायरस को लेकर चीन द्वारा ऐसा जताना कि ये कोई छोटी-मोटी चीज है, दुनिया को भारी पड़ा। ख़ुद चीन के प्रशासन ने स्वीकार किया है कि लॉकडाउन से पहले ही क़रीब 50 लाख लोग वुहान छोड़ चुके थे।
2019 में लिखे एक लेख में ‘चाइनीज एक्सप्रेस’ ने SARS या फिर MERS की तरह कोई खतरनाक वायरस के सामने आने की शंका जताई थी और कहा था कि इसकी वजह चमगादड़ ही होंगे लेकिन बावजूद इसके लगातार लापरवाही बरती गई। उस लेख में ये भी कहा गया था कि ये वायरस चीन से ही आएगा। 2019 तो छोड़िए, 2007 में ही एक जर्नल में प्रकाशित हुए आर्टिकल में बताया गया था कि साउथ चीन में चमगादड़ जैसे जानवरों को खाने का प्रचलन सही नहीं है क्योंकि उनके अंदर खतरनाक किस्म के वायरस होते हैं। उस लेख में इस आदत को ‘टाइम बम’ की संज्ञा दी गई थी। चीन में जनता बड़े स्तर पर इससे प्रभावित हुई है लेकिन दोष वहाँ की सरकार व प्रशासन का है।
एक तो चीन ने इस वायरस के प्रसार को नहीं रोका और बाद में ‘उलटा चोर कोतवाल को डाँटे’ की तर्ज पर अमेरिका और इटली को दोष देने में भी देरी नहीं की। चीन के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कई ऐसे लेख वायरल हुए, जिनमें दावा किया गया कि ये वायरस चीन नहीं बल्कि इटली से आया। इसके बाद तब हद हो गई जब चीन ने अमेरिकी सेना पर आरोप मढ़ दिया कि अमेरिका ही इस वायरस को चीन तक लाया है। एक तरह से एक प्रोपेगंडा कैम्पेन चलाया गया, ताकि किसी और को दोष दिया जा सके। चीनी मीडिया ने इटली के एक डॉक्टर का इंटरव्यू खूब चलाया और उसके आधार पर ही इटली को दोष देना तेज कर दिया।
उस डॉक्टर के बयान के आधार पर दावे किए गए कि इटली में बुजुर्गों में न्यूमोनिया की तरह कुछ फ़ैल रहा था, जो बताता है कि ये वायरस वुहान में पहली बार नहीं आया। इस लेख को चीनी सोशल मीडिया पर 50 करोड़ लोगों ने देखा और इसे ‘एक्सपर्ट की राय’ कह कर पेश किया गया। यानी चीन पूरी तरह उस थ्योरी पर चल रहा है कि किसी भी चीज को लेकर इतने अफवाह फैला दो कि लोगों को सच्चाई पता ही न चले। हज़ार ‘कांस्पीरेसी थ्योरी’ फैला कर एक सच्चाई को ढक दो। वुहान और इटली के बीच कई फ्लाइट्स चलते हैं, जिससे चीनी वायरस तेजी से यूरोप में फैला। आज स्थिति ये है कि इटली में 6000 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं।
ट्रम्प द्वारा इसे ‘चाइनीज वायरस’ कहने से बौखलाए चीनी अधिकारियों ने इसे अमेरिकी सेना की साजिश करार दिया और कहा कि अमेरिका में इसे स्टोर कर के रखा गया था ताकि समय आने पर चीन को तबाह किया जा सके। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजान ने इसे अमरीका की साजिश करार दिया और पूछा कि अमेरिका में इससे कितने लोग प्रभावित हैं, वो डेटा सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा है? उन्होंने उलटा अमेरिका से ही कहा कि वो चीन को सब कुछ एक्सप्लेन करे।
जिसने भी आवाज़ उठाई, उसे चुप करा दिया गया
चीन में 5-6 लोग ऐसे हैं जो कोरोना वायरस के बारे में सूचना सार्वजनिक करने या सवाल उठाने के बाद गायब हो गए या कर दिए गए। चीन के प्रोफेसर झु झिंग्रन ने इस बारे में बहुत कुछ बताया था। कुछ दिनों बाद उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और सारे सोशल मीडिया वेबसाइट्स से उनके एकाउंट्स गायब हो गए। ऐसे ही एक वीडियो ब्लॉगर का कुछ अता-पता नहीं चला। इन सभी को कोरोना वायरस के बारे में सवाल पूछना या सूचना देने की सज़ा मिली। डॉक्टर ली वेलिआंग ने जब स्थानीय पुलिस को कोरोना के बारे में बताया, उलटा उन्हें ही चुप करा दिया गया। कोरोना वायरस के कारण ही उनकी मौत हो गई।
चीन में ख़बरों का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है, सब कुछ सरकार द्वारा नियंत्रित किया जाता है। जब भी कोई ऐसी परिस्थिति आती है, चीन सभी सोशल मीडिया साइट्स और मीडिया की ख़बरों को खँगालने में तेज़ी कर देता है, ताकि कहीं कुछ ऐसा सार्वजनिक न हो जाए जो वहाँ की सरकार छिपाना चाहती हो। ‘ह्यूमन राइट्स डिफेंडर्स’ ने आँकड़ा गिनाते हुए बताया कि चीन के विभिन्न शहरों में 350 ऐसे लोग हैं, जिन्हें कोरोना के बारे में कुछ भी बोलने की सज़ा दी गई। एक युट्यूबर फांग ने कुछ लाशों के बारे में वीडियो बनाया था और उसे सार्वजनिक किया था, जिसके बाद उन्हें गायब कर दिया गया। उसके परिवार वाले कहते हैं कि ये सब कम्युनिस्ट पार्टी की करनी है।
कुल मिला कर बात ये है कि इसे चीनी वायरस कहना कोई रेसिज्म नहीं है। इसका अर्थ हुआ कि जिस जगह से ये वायरस पहली बार निकल कर आया, उस स्थान पर इसका नामकरण हो। ऊपर से जब चीन ने इसे ढकने की गलती करके दुनिया भर को परेशानी में डाला है तो फिर इसमें उन्हें क्यों दोष दिया जा रहा, जो इस वायरस के ऑरिजिनेट होने के स्थान के नाम पर इसे सम्बोधित कर रहे हैं? भारत-चीन की सीमा लगती है, भारत में कई लोग चीनी की तरह दिखते भी हैं और चीन से आवाजाही भी कम नहीं रही है। इसे ‘चीनी वायरस’ या ‘वुहान वायरस’ कहना ग़लत कैसे है, इसका किसी के पास कोई जवाब नहीं।