Monday, August 8, 2022
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ये रहे भोपाल और इंदौर के नए अध्यक्ष लेकिन,क्या कुछ सुधार होगा 2023 से पहले,सिर्फ अधिकारियों ,मीडिया दलालो और चाटुकारों भरोसे रहेगा मध्यप्रदेश

नगर निगम चुनाव पूरे होने के बाद अब मध्य प्रदेश में नगर निगमों और नगर पालिकाओं में सभापति के चुनाव हो रहे हैं. इंदौर Indore और भोपाल Bhopal नगर निगम में बीजेपी को इस बार पूर्ण बहुमत मिला है. ऐसे में दोनों बड़े नगर निगमों में बीजेपी की अध्यक्ष बनना तय माना जा रहा है. इस बीच बीजेपी ने इंदौर और भोपाल में अध्यक्ष पद के लिए अपने प्रत्याशियों के नामों की घोषणा कर दी है.

भोपाल में किशन सूर्यवंशी

राजधानी भोपाल Bhopal के नगर निगम में अध्यक्ष पद के लिए बीजेपी ने किशन सूर्यवंशी Kishan Suryavanshi को अध्यक्ष पद के लिए अधिकृत प्रत्याशी बनाया है. किशन सूर्यवंशी भोपाल के वार्ड नंबर 28 से पार्षद चुने गए हैं. बता दें कि किशन पेशे से वकील है और लंबे समय से संघ से जुड़े थे, वह  एबीवीपी, युवा मोर्चा में भी कई पदों पर रहे वह दूसरी बार पार्षद चुने गए हैं.  बता दें कि भोपाल के 85 वार्डों में से 58 पार्षद बीजेपी के हैं. ऐसे में बीजेपी का अध्यक्ष चुना जाना तय है. आज दोपहर 3 बजे कलेक्टर की मौजूदगी में अध्यक्ष के चुनाव को लेकर औपचारिकता होगी. हालांकि, पार्षदों की संख्या को देखते हुए सूर्यवंशी के निर्विरोध चुने जाने के पूरे आसार है.

इंदौर में मुन्नालाल यादव
वहीं इंदौर Indore नगर निगम में बीजेपी ने मुन्नालाल यादव Munnalal Yadav को प्रत्याशी बनाया है. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा ने नगर निगम के सभापति प्रत्याशी पद के लिए भाजपा के वरिष्ठ नेता मुन्नालाल यादव के नाम पर मुहर लगाई. मुन्नालाल यादव पांचवीं बार पार्षद चुने गए हैं, उनकी गिनती बीजेपी के वरिष्ट नेताओं में होती है.

विजयवर्गीय-मेंदोला के खास हैं यादव
मुन्नालाल यादव इंदौर में बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय Kailash Vijayvargiya और विधायक रमेश मेंदोला Ramesh Mendola के खास माने जाते हैं. बताया जा रहा है कि इन दोनों नेताओं का समर्थन यादव को मिला हुआ था, जिसके चलते उनकी राह आसान हो गई. मुन्नालाल यादव इंदौर के वार्ड नंबर-27 से चुनाव जीते हैं, जो विधानसभा-2 में आता है, यह रमेश मेंदोला यही से विधायक है. यादव दो बार नगर निगम की एमआईसी में भी रह चुके हैं. बता दें कि इंदौर के 85 में से 64 वार्डों में बीजेपी के पार्षद चुनाव जीतकर आए हैं, ऐसे में बीजेपी का अध्यक्ष बनना तय है.

दोनों शहरों में बीजेपी को मिली है बड़ी जीत
इंदौर और भोपाल नगर निगम में बीजेपी को बड़ी जीत मिली है. दोनों शहरों में बीजेपी के महापौर प्रत्याशी बड़े अंतर से चुनाव जीतकर आए हैं. इंदौर में बीजेपी के पुष्यमित्र भार्गव 1 लाख 20 हजार से भी ज्यादा वोटों से चुनाव जीते हैं, जबकि भोपाल में बीजेपी की मालती राय 99 हजार से भी ज्यादा वोटों से चुनाव जीती हैं. दोनों शहरों में महापौरों ने अपना काम संभाल लिया है.

विंध्य क्षेत्र भाजपा का गढ़ बन चुका है इसके में कोई संदेह नही. जिस प्रकार से कई वर्षो में भाजपा ने निचले स्तर से लेकर ऊपर तक अपनी पैठ जनता के बीच बनाई है, उससे बूथ स्तर पर भाजपा मजबूत हुई है. लेकिन हाल ही में सम्पन्न हुए नगरीय निकाय, पंचायत चुनाव में जिस तरह से जनादेश सामने आया है, उससे यह कहना गलत नही होगा कि भाजपा के प्रति लोगो का मोह भंग हो रहा है. वहीं भाजपा के कई गढ़ ढ़हाने के बाद कांग्रेस उत्साहित नजर आ रही है. कहीं न कहीं सत्ता के अहम पर जनता के जनादेश की चोट हुई है. दरअसल महापौर से लेकर जनपद, जिला पंचायतों में लगातार भाजपा का कब्जा रहता था पर इस बार ऐसा नही रहा. कई जगह भाजपा को हार मिली. सिंगरौली में जिला सरकार भाजपा नही बना पाई और महापौर चुनाव भी हार गई.

रीवा में महापौर चुनाव हारी. इसी तरह कई जनपद पंचायत, नगर पंचायत में कांग्रेस का कब्जा हुआ, यहां पर अभी तक भाजपा स्थापित थी. जो जनादेश इस चुनाव में सामने आया है उसमें जनता ने यह बताने का प्रयास किया है कि अब भाजपा से उतना मोह नही है. इसके पीछे तमाम कारण हैं भाजपा की  गुटबाजी और नेताओं की आपसी मतभेद आदि. कांग्रेस की अगर जीत हुई है तो यह जनता के आक्रोश का ही परिणाम है. भाजपा के गढ़ में जिस तरह से कांग्रेस ने सेंध लगाई है उससे भाजपा संगठन हिल गया है और अब विचार मंथन के साथ चिंतन किया जा रहा है कि आखिर कैसे भाजपा अपने विंध्य गढ़ को बचाये. जनता का रूख धीरे-धीरे कांग्रेस की ओर हो रहा है और यह आगामी विधानसभा चुनाव के लिये सुखद कांग्रेस के लिये हो सकता है. परन्तु भाजपा के लिये खतरे की घंटी है. हालाकि अभी हुए चुनाव में भाजपा को सम्भलने का अलार्म दे दिया है.

अपने क्षेत्र में हारे विधायक

नगर पंचायत चुनाव में भाजपा की जीत हुई और नगर पंचायत अध्यक्ष बनाने में भाजपा सफल रही. 9 नगर पंचायत में भाजपा का कब्जा रहा. लेकिन मऊगंज विधानसभा क्षेत्र के विधायक अपने ही क्षेत्र में बुरी तरह से हार गए. मऊगंज एवं हनुमना नगर पंचायत में भाजपा का अध्यक्ष नही बना. मऊगंज में तो 9 पार्षद भाजपा के थे, बावजूद इसके निर्दलियों को साध कर कांग्रेस अपना अध्यक्ष बनाकर भाजपा की चाल को उलटा कर दिया. जबकि यहां पहले से ही तय था कि भाजपा का कब्जा नगर पंचायत में होगा पर कांग्रेस की रणनीति के आगे भाजपा के सभी दांव पेंच उल्टे पड़ गए. दोनो नगर पंचायत मऊगंज विधानसभा में आती है और यहां मिली हार को आगामी विधानसभा चुनाव से जोड़ कर देखा जा रहा है. दरअसल कांग्रेस के पूर्व विधायक सुखेन्द्र सिंह बन्ना की रणनीति यहां पर काम कर गई.

सदस्यता अभियान में जुटी ‘आप’
नगरीय निकाय चुनाव में जिस तरह से विंध्य क्षेत्र में आप पार्टी उभर कर आई है उससे भाजपा-कांगे्रस सहित कई पार्टियों की चिंता बढ़ गई है. सिंगरौली में जिस तरह से एकतरफा जीत महापौर चुनाव में मिली, उससे आप पार्टी का उत्साह सातवें आसमान में है. तीसरे विकल्प के रूप में आप पार्टी स्थापित होने जा रही है और आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर विंध्य में सदस्यता अभियान शुरू कर दिया गया है. ज्यादा से ज्यादा लोगो को पार्टी से जोडऩे के लिये अभियान चलाया जा रहा है ताकि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा को आप पार्टी टक्कर दे सके. जनहित के मुद्दों को लेकर भी पार्टी तेजी से काम कर रही है. चुनाव को लेकर अभी एक साल से अधिक का समय है, ऐसे में आप पार्टी सदस्यता अभियान के सहारे हर विधानसभा में खुद को स्थापित करने में लगी है.

जीत का श्रेय लेने की मची होड़
ऊर्जाधानी में भाजपा को महापौर के चुनाव में भले ही करारी शिकस्त मिली हो और हार का ठीकरा किन-किन नेताओं पर फोड़ा जायेगा. अभी कुछ कह पाना मुश्किल है. प्रदेश संगठन भी कार्यवाई करने की तैयारी कर रहा है. स्पीकर पद पर भाजपा ने सफलता हासिल की है और अब जीत का श्रेय लेने के लिये होड़ सी मच गई है. दरअसल महापौर पद अति आत्मविश्वास में भाजपा ने खो दिया. नेताओं की आपसी नाराजगी यहां मंहगी पड़ी और आम आदमी पार्टी बीजेपी के परम्परागत वोट पर सेंध लगाने में सफल रही. हार से सबक लेकर स्पीकर बनाने में भाजपा सफल तो हो गई और अब नेता जीत का श्रेय लेने में लगे हुए है.

दुर्गति पर चुप्पी बनाये हुए है
जनसंपर्क विभाग लगा मीडिया मैनेजमेंट में

ग्वालियर, मुरैना में महापौर पद पर हार के बाद नगर निगम अध्यक्ष के चुनाव से सोचा जाने लगा है कि तोमर और सिंधिया का आभा मंडल निस्तेज तो नहीं होने लगा? तोमर की साख दांव पर इसलिए ज्यादा है क्योंकि जिस मुरैना से वे सांसद हैं, वहां महापौर के बाद निगम अध्यक्ष भी कांग्रेस का जीत गया। कहा जाने लगा है कि नरेंद्र सिंह अब सिर्फ क्षत्रियों के नेता बचे हैं। तोमर और सिंधिया मिलकर भी ग्वालियर का किला नहीं बचा पा रहे हैं। ग्वालियर नगर निगम के अध्यक्ष पद पर एक वोट से जीत से किसी तरह इज्जत बची है।

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लगभग यही स्थित तीसरे कद्दावर केंद्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल की है। प्रहलाद दमोह से सांसद हैं। सागर का हिस्सा तीन मंत्री गोविंद सिंह राजपूत, भूपेंद्र सिंह और गोपाल भार्गव मिलकर जिता ले गए, लेकिन दमोह में प्रहलाद कुछ नहीं कर सके। अकेले जयंत मलैया के बेटे सिद्धार्थ उन्हें मात दे रहे हैं। दमोह, के बाद पथरिया और हिंडोरिया नगर पालिका में भी भाजपा पराजित हो गई। तो क्या प्रहलाद सिर्फ लोधी मतदाताओं के नेता बचे हैं?

ग्वालियर, मुरैना, दमोह से फिर खतरे की घंटी….

– पंचायत और निकाय चुनावों की तरह निकाय अध्यक्ष के पदों पर भी अधिकांश स्थानों पर भाजपा के प्रत्याशी जीते हैं, लेकिन ग्वालियर, मुरैना और दमोह सहित कुछ ऐसे शहर भी हैं, जो उसके लिए खतरे की घंटी बजा रहे हैं। पहले बात ग्वालियर की। महापौर पद पर हार के बाद भाजपा ने यहां निगम परिषद अध्यक्ष में जीत के लिए पूरी ताकत झोंकी।

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भाजपा के 34 और कांग्रेस के 25 पार्षद ही चुनाव जीते थे, इस नाते भाजपा की जीत पक्की थी। फिर भी पहले से घेराबंदी कर पार्षदों को बाहर ले जाया गया। 7 अन्य पार्षद जीते थे। दावा किया जा रहा था कि 4 अन्य भी भाजपा के साथ हैं। चुनाव हुआ तो भाजपा ने जीत दर्ज की लेकिन नतीजों ने भाजपा के नीचे से जमीन खिसका दी। उसे 34 वोट ही मिले जबकि कांग्रेस 33 वोट लेने में सफल रही। अर्थात कांग्रेस की तुलना में 9 वोट ज्यादा होने के बावजूद भाजपा महज एक वोट के अंतर से जीत सकी। इसी प्रकार महापौर के बाद मुरैना में कांग्रेस का सभापति भी जीत गया। दमोह में जयंत मलैया को किनारे करने का नुकसान जारी है। जिला पंचायत अध्यक्ष के बाद दमोह नगर पालिका अध्यक्ष पद पर भी कांग्रेस का कब्जा हो गया। जिले की पथरिया में भी कांग्रेस जीत गई। भाजपा के लिए यह खतरे की घंटी ही तो है।

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