Saturday, August 1, 2020
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सुशांत सिंह पहला नहीं,आजतक इनकी लाशों की अधूरी जांच,बॉबी निशा,शिल्पी,नवरूणा….और भी

बॉबी ने बिहार विधानसभा सचिवालय में 1978 में टेलीफोन ऑपरेटर के रूप में नौकरी ज्वाइन की थी। बाद में वह टाइपिस्ट हो गई थी। बॉबी विधान परिषद की सभापति राजेश्वरी सरोज दास की गोद ली हुई बेटी थी। वह काफी खूबसूरत थी और उसकी खूबसूरती की चर्चा विधायकों-मंत्रियों के कोठियों में हुआ करती थी। अय्याश सफेदपोश उसे देखकर लार टपकाते रहते थे। अचानक सात मई 1983 को उसकी मौत हो गई। उसकी मौत के दो मृत्यु प्रमाण पत्र भी जारी हो गये और जल्दी-जल्दी कर उसे पटना के पीरमोहानी कब्रिस्तान में दफना दिया गया।
10 मई को हिंदी दैनिक आज में पहली बार खबर छपी कि बॉबी की मौत में हाईप्रोफाइल लोग जुड़े हुए हैं। इसके बाद प्रदीप में भी छपने लगा। मामला मीडिया में उछला और बॉबी की मौत के चार दिन बाद पटना के डीएम के निर्देश पर तत्कालीन एसएसपी किशोर कुणाल ने शव को कब्रिस्तान से फिर से निकलवाया। ये वही कुणाल हैं, जो अब महावीर मंदिर पटना की न्यास समिति के प्रमुख हैं। डीएम थे राजकुमार सिंह, जो अब नरेंद्र मोदी के कैबिनेट में शामिल हैं। उन्होंने ही समस्तीपुर के डीएम रहते हुए 30 अक्टूबर 1990 को आडवाणी को रथयात्रा के दौरान गिरफ्तार किया था।

बहरहाल, शव काफी हद तक गल चुका था, फिर भी पुलिस ने विसरा भेजा। विसरा के परीक्षण से पता चला कि मौत का कारण मेलाथियन नामक कीटनाशक है। पुलिस जांच करने लगी। सबसे पहली गड़बड़ी मिली मृत्यु प्रमाण पत्रों में। पहला प्रमाण पत्र जारी किया था विधानसभा के डॉ. केके झा ने। उनके मुताबिक मौत का कारण आंतरिक रक्तस्राव था। उन्होंने सुबह चार बजे परीक्षण करने की बात लिखी थी। दूसरा प्रमाण पत्र था इंदिरा गांधी इंस्टीच्यूट ऑफ कार्डियोलॉजी के डॉ. अशोक कुमार ठाकुर का। उन्होंने मौत का कारण सुबह साढ़े चार बजे कार्डियक अरेस्ट बताया था।

व्यक्ति की दो अलग-अलग कारणों से दो अलग-अलग समय पर मौत हो सकती है। पुलिस ने भी नहीं माना। प्राकृतिक मौत में तुरंत मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने की आवश्यकता भी नहीं थी। बाद में पता चला कि दोनों ही मृत्यु प्रमाण पत्र फर्जी बनवाए गये थे।

पुलिस ने जांच आगे बढ़ाई। पता चला कि बॉबी को पीएमसीएच के इमरजेंसी वार्ड में भर्ती कराया गया था। केस मैंडेक्स प्वाइजनिंग का था। रिकॉर्ड के अनुसार उसने चार गोलियां ली थीं और फिर सुबह तक उसकी मौत हो गई। पुलिस रिपोर्ट की मुताबिक, बॉबी की हत्या की गई थी।

पुलिस की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी, सत्तारूढ़ खद्दरधारियों की हालत खराब होती जा रही थी। जांच में पता चला कि एक उप नेता और कई विधायकों तथा एक विधानसभा अधिकारी के साथ बॉबी का अफेयर चल रहा था। इनमें जिस नाम की चर्चा अधिक थी, वह था विधानसभा अध्यक्ष राधानंदन झा के बेटे रघुवर झा का। राजेश्वरी ने भी अदालत में दिये गये अपने बयान में रघुवर झा का ही नाम लिया था। किशोर कुणाल पर जांच रोक देने के लिए जोरदार दबाव दिया जाने लगा। परंतु, वह किसी दबाव के बिना जांच आगे बढ़ाते चले गये। जब विधायकों की गिरफ्तारी तक बात पहुंचने लगी तब एक दिन ढेर सारे विधायक (कुछ 40 बताते हैं और कुछ 100) मुख्यमंत्री के पास पहुंच गये। विधायकों ने कहा कि जांच सीबीआई के हवाले कीजिए या फिर सरकार गिरा दी जाएगी। मुख्यमंत्री थे जगन्नाथ मिश्र। ये वही जगन्नाथ मिश्र हैं, जिन्होंने चारा घोटाले की शुरुआत की थी। उन्होंने सरकार बचा ली और इंसाफ को गिरा दिया। 25 मई 1983 को जांच सीबीआई के हवाले कर दिया गया। जांच अधिकारी थे एन तिवारी।

तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा

सीबीआई तुरंत इस नतीजे पर पहुंच गई कि बॉबी की मौत उन चार गोलियों के खाने से हुई है। उसने गोलियां खाकर आत्महत्या कर ली क्योंकि उसके प्रेमी ने धोखा दिया था। सीबीआई ने उस जहर से मौत की बात कही, जिसका विसरा की रिपोर्ट में कहीं जिक्र ही नहीं था। न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में 18 मार्च 1984 को यह चर्चित केस बंद कर दिया गया। तब एक विधायक ने सरेआम यह तर्क दिया कि अगर बॉबी कांड को रफा-दफा नहीं करवाया जाता तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता। सजा के तौर पर किशोर कुणाल का पटना से तबादला कर दिया गया था।

राज्य सरकार ने 25 मई 1983 को इस केस की जांच का भार सीबीआई को सौंप दिया. सीबीआई पर भी हाई लेवल दबाव पड़ा और आखिर में केस रफा-दफा हो गया. सत्ताधारी नेताओं को बचाने की हड़बड़ी में सीबीआई ने बेसिर पैर की कहानी गढ़कर कोर्ट में फाइनल रिपोर्ट के तौर पर लगा दी. हत्या को आत्महत्या का रूप दे दिया गया.
उससे पहले इस केस के अनुसंधान के सिलसिले में सीबीआई की टीम ने कभी पटना पुलिस से संपर्क नहीं किया. सीबीआई ने अपने आॅफिस में बैठे-बैठे ही फाइनल रिपोर्ट तैयार कर दी. सीबीआई ने अपनी फाइनल रिपोर्ट में लिखा कि बाॅबी ने सेंसिबल टेबलेट खाकर आत्महत्या कर ली क्योंकि उसके प्रेमी ने उसे धोखा दिया था. सीबीआई ने यह भी लिखा कि अस्पताल के रास्ते में बाॅबी को दस्त हो रहा था.
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट या विसरा जांच रिपोर्ट में कहीं भी सेंसिबल टेबलेट का नामोनिशान नहीं मिला था बल्कि मेलेथियन का अंश पाया गया. सीबीआई ने कहा कि पटना फारेंसिक लेबोरेटरी में रखे किसी अन्य के विसरा का मेलेथियन बाॅबी के वेसरा में मिल गया होगा.
दूसरी ओर पटना फोरेंसिक लेबोरेट्री के अफसर ने लिख कर दिया कि सीबीआई को हमारे यहां से किसी ने ऐसी कोई बात नहीं कही. यहां ऐसी लापरवाही नहीं बरती जाती कि एक-दूसरे का विसरा आपस में मिल जाए.
सीबीआई ने पत्र को आधार बनाया
बाॅबी की आत्महत्या की कहानी को सही साबित करने के लिए सीबीआई ने एक ऐसे पत्र को आधार बनाया जिसका अस्तित्व ही नहीं था.
सीबीआई के अनुसार बाॅबी ने 6 मई 1983 की रात में अपने प्रेमी रतन जगवानी के नाम यह पत्र लिखा कि, ‘मैंने आत्महत्या के लिए जहर खा लिया है. सीबीआई के अनुसार रतन बाॅबी से शादी करने के लिए तैयार नहीं था. बाॅबी ने यह पत्र निर्भय को इसलिए दिया कि वह इसे जगवानी को दे दे. निर्भय ने दूसरे दिन यह कथित पत्र रतन को दे दिया, जिसे पढ़ने के बाद रतन ने निर्भय को वापस लौटा दिया.
शिल्पी- गौतम बलात्कार (?) और ह्त्या कांड (1999)
3 जुलाई 1999 को गांधी मैदान थाना क्षेत्र के 12 नंबर विधायक क्वार्टर के गैराज से सफ़ेद मारुति जेन से गौतम और शिल्पी की लाश मिली थी.  शिल्पी पटना के व्यवसायी उज्जवल कुमार जैन की बेटी थी. जैन कमला स्टोर्स के मालिक थे. शिल्पी पटना विमेंस कॉलेज की छात्रा थी और उसका बॉयफ्रेंड गौतम राजद से जुड़ा हुआ था और MLA और लालू यादव के साले साधू यादव के साथ फ्रेज़र रोड में स्थित सिल्वर ओक रेस्टोरेंट में बिज़नस पार्टनर था.  कहा ये भी जाता है कि गौतम के पिता बी एन सिंह ने चारा घोटाले का पैसा हवाला के जरिये विदेशी बैंकों में जमा करवाने में बड़ा रोल प्ले किया था.
दोनों प्रेमी युगल पिछले सात आठ घंटे से लापता थे. पुलिसिया जांच एकदम ढुलमुल तरीके से चल रही थी. घटना स्थल पर पुलिस के पहुँचने से पहले  राजद समर्थक हल्ला मचा रहे थे. यह पता नहीं चला कि उन्हें इस बात की जानकारी कैसे हुई. पुलिस दोनों लाशों के साथ गाडी को थाने ले गयी और बाद में स्टीयरिंग व्हील पर कोई फिंगर प्रिंट नहीं मिले.
शुरुआत से ही पुलिस दावा कर रही थी कि दोनों की मौत कार्बन मोनो ऑक्साइड पोइजनिंग से हो गयी थी. जबकि दोनों के बदन पर नोचने के और जूते से पीटे जाने के निशाँ थे. जब विसरा रिपोर्ट में बात सामने आई कि शिल्पी और गौतम के शरीर में खतरनाक एल्युमीनियम XXXXX पाया गया है, तो पुलिस ने इसे आत्महत्या का केस करार दिया.
उस समय के सिटी एसपी भाटिया ये नहीं बता पाए कि पोस्ट मोर्टेम रिपोर्ट में कैसे शिल्पी के बदन पर एक से अधिक व्यक्ति के वीर्य के ट्रेस मिले. उस समय पटना में ये अफवाह उडी हुई थी कि घटना वास्तव में २ जुलाई १९९९ को हुई थी, पर गांधी मैदान थाना के अंतर्गत विधायक आवास पर नहीं, बल्कि बालमी में. और वहां से बॉडी यहाँ लाये गए थे.
फाइनली केस सीबीआई को सौंप दिया गया. शिल्पी का vaginal fluid डीएनए टेस्ट के लिए हैदराबाद भेजा गया. डीएनए टेस्ट से सुनिश्चित हुआ कि मरने से पहले शिल्पी के साथ एक से अधिक लोगों ने बलात्कार किया था.  लेकिन इन लोगों की पहचान उजागर नहीं की गयी. कोर्ट में लम्बी सुनवाई के बाद फाइनली केस को सुसाइड घोषित कर दिया गया.
कुछ समय बाद, जब शिल्पी  का भाई केस री ओपन करने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहा था, तो उसे उसके घर के सामने से उठा लिया गया.
बूटन सिंह हत्याकांड (2000):
19 अप्रैल 2000 की सुबह समाज कल्याण मंत्री लेसी सिंह के पति बूटन सिंह उर्फ मधुसूदन सिंह जब पूर्णिया के व्यवहार न्यायालय में पेश होने के लिए जा रहे थे, उसी समय अभियुक्तों ने न्यायालय गेट के मुख्य द्वार पर ही गोली मार कर उनकी हत्या कर दी थी. खजहाट थाना में छह-सात अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था. बाद में इस मामले को अनुसंधान के लिए सीबीआइ को सौंपा गया. सीबीआइ ने छह जुलाई 2001 को मामला दर्ज कर आठ अभियुक्तों के खिलाफ पांच फरवरी 2004 को आरोप पत्र दाखिल किया था. उक्त मामले में जिन लोगों को अभियुक्त बनाया गया है उनमें पूर्व विधायक दिलीप यादव,असीम कुमार,राघवेंद्र नारायण सिंह,मनोज यादव, विजय सिंह,विपिन कुमार,राम नारायण यादव व निशिकांत यादव शामिल हैं. हत्या का कारण राजनीतिक दुश्मनी बताया गया. हत्या के समय मृतक बूटन सिंह एक दूसरे मामले में जेल में बंद थे.
बूटन सिंह उर्फ मधुसूदन सिंह की उन दिनों पप्पू यादव के साथ वर्चस्व की लड़ाई चल रही थी.
सरिता महेश हत्याकांड (2004):
सरिता और महेश ने लम्बे समय से आर्थिक सामाजिक अन्याय और अराजकता की चपेट में पड़े बिहारी समाज को निजात दिलाने की दृष्टि से सामूहिक खेती और सामुदायिक विकास के अनेक प्रयोग किये थे. उन्होंने फतेहपुर, गया में लगभग चार वर्षों तक काम करके तक़रीबन चालीस गावों को अपना कार्यक्षेत्र बनाया था. उनके प्रयासों से करीब पैंतालिस किलोमीटर में फैले हद हदवा पईन और उसकी शाखाओं तथा उससे जुड़े अनेक आहरों का जीर्णोद्धार, कुछ गावों में शराब बंदी, आपसी झगड़ों का निबटारा, स्वच्छता, बच्चों और वयस्कों की शिक्षा, ग्राम संगठनों का निर्माण, महिलाओं के ऊपर हिंसा का निवारण, गावों में बिजलीकरण, एक गाँव सब्दो में सामूहिक खेती और सामूहिक मछलीपालन, भूमिहीन भुइयां परिवारों को जमीन पर कब्ज़ा दिलाना, विकलांगों का पुनर्वास, आदि काम किये गए. कुछ काम अधूरे भी रह गये.
इन कामों के लिए उन्होंने श्रमदान, ग्राम समितियों का गठन और सामूहिकता को बढ़ावा देने को अपना बुनियादी उसूल बनाया था. विकास मद के सरकारी पैसे को सीधे ग्राम समितियों को स्थानांतरित कराने और सरकारी स्कीमों में व्याप्त भ्रष्टाचार का खात्मा करने का प्रयास किया गया. इससे सरकारी पैसे का बंदरबांट करने वाले और क्षेत्र के अपराधी, बाहुबली, राजनीतिज्ञ के स्वार्थों पर चोट पहुंची. और २४ जनवरी २००४ को इन दो समर्पित सामाजिक कार्यकर्ताओं की बेरहमी से ह्त्या कर दी गयी.
आकाश पांडेय अपहरण कांड (2007)
पटना के शास्त्रीनगर थाना इलाके में 11 साल पहले 10 अगस्त 2007 को डीएवी के छात्र आकाश पांडेय का अपहरण हुआ था. इस अपहरणकांड की जांच शुरु हुई लेकिन इस मामले में अब तक कोई गिरफ्तारी तक नहीं हुई. मामले का खुलासा तो फिलहाल दूर की बात है.
संतोष टेकरीवाल हत्याकांड( 2009)
10 जुलाई 2009 को  पटना के ट्रांसपोर्ट नगर थाना इलाके की इस घटना में एजेंसी के मालिक संतोष टेकरीवाल की हत्या कर दी गई थी. मामले की जांच सीबीआई ने शुरु की. आलम ये है कि लगता है  लोगों के साथ-साथ सीबीआई भी इस हत्याकांड को भूल गई है.
सूबे के टाप टेन ट्रांसपोर्टरों में एक संतोष टेकरीवाल हत्याकाण्ड की फाइल आठ माह बाद सीबीआई को सौंपे जाने के बाद जहां परिजनों में उद्भेदन की आस जगी थी वहीं जांच के तीन वर्ष बाद भी सीबीआई हत्यारे की अब तक पहचान नहीं कर सकी है। पटना पुलिस द्वारा हत्याकाण्ड के बाद जांच में लापरवाही बरती गई। शुरुआत में ही तेज-तर्रार अनुसंधानक की जगह अंडर ग्रेजुएट दरोगा को अनुसंधान का जिम्मा देने की भूल की गई। काण्ड के अनुसंधानक बदलते गये लेकिन चार्जशीट सौंपे जाने तक हत्या का कारण स्पष्ट नहीं हो सका।
कदमकुआं थाना क्षेत्र के राजेन्द्र नगर रोड 5 में एक स्कूल के समीप 12 जून 09 की रात्रि लगभग 8.30 बजे अपराधियों ने आजाद ट्रांसपोर्ट कम्पनी के मालिक संतोष टेकरीवाल की कार में गोली मारकर हत्या कर दी। हत्या के बाद ट्रांसपोर्टर के बहनोई सुनील गोयल उर्फ टीनू द्वारा दर्ज प्राथमिकी 166/09 में कई ऐसे बिन्दुओं का जिक्र है कि उन पर अनुसंधान होता तो रहस्य से पर्दा उठता। घटना के बाद कार के चालक सत्येन्द्र ने साला सुनील को फ्लैट पर आकर सूचित किया कि संतोष टेकरीवाल की गोली मारकर हत्या कर दी गयी है। जब साला घटनास्थल पर कार के समीप आये तो देखा कि बहनोई खून से लथपथ हैं और उनके बगल में कविता व शुभम् साथ बैठे हैं।
प्राथमिकी में यह भी बताया गया है कि बायीं तरफ से मोटरसाइकिल के पास खड़े दो अपराधियों द्वारा गोली चलाकर हत्या की गयी है. प्राथमिकी में यह उल्लेख है कि एक षड्यंत्र के तहत बहनोई संतोष टेकरीवाल की हत्या की गयी है. काण्ड के बाद अनुसंधान का जिम्मा अंडरग्रेजुएट पुलिस अवर निरीक्षक परमहंस सिंह को दिया गया. मामला चर्चित व रहस्य से पर्दा को न उठते देख पुलिस ने अपनी भूल मानते हुए 12 दिन बाद कांड के अनुसंधान का जिम्मा कदमकुआं थाना में ही पदस्थापित अवर निरीक्षक डा. शंकर कुमार झा को दिया.
अनुंसधान के दौरान कुछ साक्षियों ने व्यवसायिक विद्वेष, भाई-भतीजा के पारिवारिक विवाद, शंभू शरण से विवाद, मृतक द्वारा साला का व्यापार करवाना, धनुकी मोड़ अगमकुआं के पास जमीनी विवाद होना आदि पर संदेह प्रकट किया। पटना पुलिस आठ माह के अंदर कांड के उदभेदन के करीब पहुंच कर भी असफल रह गई। सीबीआई के इंस्पेक्टर अलय कुमार ने बताया कि मामले में अब भी जांच जारी है.
रूपम हत्याकांड काण्ड (2011)
गौरतलब है कि राजहंस पब्लिक स्कूल की संचालिका रुपम पाठक ने पूर्णिया के तत्कालीन भाजपा विधायक राज किशोर केशरी और उनके पीए विपिन राय के खिलाफ सीजेएम कोर्ट में यौन शोषण का मुकदमा दायर किया था.
ये महिला तब सुर्खियों में आई थी, जब इसने पूर्णिया के विधायक रहे राज किशोर केसरी की चाकू मारकर हत्या कर दी थी। महिला ने हत्या के बाद जो आरोप लगाए थे, वो भी सनसनीखेज थे। बताया जाता है कि आम दिनों की तरह पूर्णिया के विधायक सिपाही टोला स्थित अपने आवास पर दो-चार समर्थकों के साथ बैठे हुए थे, तभी रूपम पाठक चादर लपेटे आई और बात करने के बहाने विधायक को अलग ले गई। इस महिला ने चादर की ओट में छिपाए चाकू को निकाला और विधायक के पेट में मार दिया। चाकू लगने के बाद विधायक वहीं पर गिर पड़े। आवाज सुनकर समर्थक फ़ौरन विधायक के पास दौड़े और तुरंत उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया। लेकिन वह बच नहीं सके।
वहीं, इस घटना के बाद आक्रोशित समर्थकों ने रूपम की जमकर पिटाई करने के बाद कमरे में बंद कर दिया। घटना की सूचना मिलने पर मौका-ए-वारदात पर पहुंची पुलिस ने देखा कि रूपम की हालत गंभीर थी। ऐसे में पुलिस ने उसे इलाज के लिए इसे कटिहार मेडिकल कॉलेज भेज दिया। विधायक हत्याकांड मामले में रुपम पाठक को घटना के ही दिन यानि चार जनवरी 2011 को विधायक के आवास से गिरफ्तार किया गया था, जबकि दूसरे आरोपी और पूर्णिया के ही निजी पत्रिका के संचालक नवलेश पाठक को 6 जनवरी 2011 की सुबह उनके बी कोठी स्थित पैतृक आवास से गिरफ्तार किया गया। हाई कोर्ट से मिली जमानत के बाद रिहा रूपम को सुप्रीम कोर्ट ने राहत नहीं दी और जमानत खारिज कर दिया।
रूपम पाठक को इस मामले में दोषी करार देने के बाद पटना स्थित सीबीआई की विशेष अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
राहुल गौतम हत्याकांड (2012)
पटना का चर्चित गौतम हत्याकांड. हाईकोर्ट अधिवक्ता के पुत्र राहुल गौतम के इस हत्याकांड में 2012 में  जांच सीबीआई ने अपने हाथ में ली लेकिन सीबीआई के हाथ आज भी खाली हैं. रामनगरी में रहने वाले अधिवक्ता आदित्य पाण्डेय ने बताया कि पूरे मामले के पीछे उस लड़की का हाथ होने की पूरी संभावना है, जिसके भाई को उनके बेटे ने वारदात के 15 दिन पूर्व ही कम्प्यूटर की अपनी दुकान एसबीएनएस से पैसों की हेराफेरी के चलते निकाला था.
बताते चलें कि मजिस्ट्रेट कालोनी की एक गली से 20 अक्टूबर 11 की सुबह राजीव नगर पुलिस ने एक कार से राहुल का शव बरामद किया था. पहले तो इसे आत्महत्या करार दिया गया, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला दबा कर हत्या की बात सामने आने के बाद पुलिस हरकत में आई थी. आदित्य ने बताया कि निकाले गए लड़के आशुतोष श्रीवास्तव की बहन के अंशु तिवारी नामक एक लड़के से मधुर संबंध हैं और जांच में यह बात सामने आई है कि 18 से 20 अक्टूबर के बीच 186 बार टेलीफोन पर बात हुई है. सारी बातें सामने आने के बाद पुलिस ने अंशु से पूछताछ की और उसे छोड़ दिया था, जिसके बाद से वह फरार है. उन्होंने बताया कि राहुल की हत्या 19 अक्टूबर की सुबह 10.30 बजे से 11 बजे की बीच हुई, जबकि शव अगले दिन बरामद हुआ. इस मामले में विनोद, गौतम, सन्नी और प्रिंस को नामजद किया गया था, सभी को पुलिस ने पकड़ा पर किस बिना पर छोड़ दिया, यह बात समझ में नहीं आ रही है. उन्होंने बबलू और अनिल राय नामक उन लड़कों पर भी शक जताया, जो आशुतोष को निकाले जाने के बाद अंशु के साथ पैरवी को गए थे, जिनको राहुल ने डांट कर भगा दिया था.
नवरूणा हत्याकांड (2012):
सातवीं कक्षा की बंगाली मूल की 12 वर्षीया नवरुणा नगर थाना क्षेत्र के जवाहर लाल रोड निवासी अतुल चक्रवर्ती की पुत्री थी. 18 सितंबर, 2012 की रात वह अचानक गायब हो गयी, जब वह अपने कमरे में सो रही थी. परिजन जब सुबह उठे, तो नवरुणा के कमरे में गये. वहां उन्होंने देखा कि नवरुणा के कमरे में लगी खिड़की का छड़ उखड़ा है. नवरुणा अपने बिछावन पर नहीं है. इसके बाद मां मैत्री चक्रवर्ती ने नवरुणा के अपहरण को लेकर नगर थाने में मामला दर्ज कराया था.
थाना व सीआईडी जांच के बाद मामला सीबीआई को
नगर थाने की पुलिस ने नवरुणा के गायब हो जाने के मामले को प्रेम प्रसंग बताया था. मामला बढ़ने पर सीआइडी जांच करायी गयी थी. लेकिन, जनवरी, 2014 में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से सीबीआई को जांच सौंप दी गयी थी.
फॉरेंसिक टेस्टडीएनए के बाद बरामद कंकाल की पुष्टि 
26 नवंबर, 2012 को ही नवरुणा के घर के पास स्थित नाले से कंकाल मिला था. अगले दिन बरामद कंकाल को जांच के लिए फॉरेंसिक लैब भेज दिया गया. इसके बाद 10 दिसंबर, 2012 को फॉरेंसिक रिपोर्ट में बरामद कंकाल 12 से 15 वर्ष की लड़की बतायी गयी. इसके बाद 25 दिसंबर, 2012 को डीजीपी ने डीएनए जांच की अनुमति दे दी थी. हालांकि, नवरुणा के माता-पिता ने पुलिस को अपना ब्लड सैंपल देने से इनकार कर दिया. बाद में सीबीआई के अनुरोध पर 25 मार्च, 2014 को नवरुणा के माता-पिता ने अपना ब्लड सैंपल दे दिया. इसके बाद जांच में नवरुणा का कंकाल होने की पुष्टि हुई थी.
जांच में मुजफ्फरपुर के भू माफियाओं का नाम उभर कर सामने आया. जेल भेजे जाने वालों में जिप के पूर्व उपाध्यक्ष तीन कोठिया निवासी शाह आलम शब्बू, बेला रोड के विक्रांत कुमार शुक्ला उर्फ विक्कू शुक्ला, शिवाराम होटल के मालिक अभय गुप्ता, सूतापट्टी शीतलागली के ब्रजेश सिंह, दुर्गास्थान रोड मोतीपुर के विमल अग्रवाल व अंडीगोला रघुवंश रोड के राकेश कुमार सिंह शामिल हैं.
संपत्ति के लोभ में घटना में सभी थे शामिल
सीबीआइ के अनुसार नवरुणा की हत्या संपत्ति की खरीद-बिक्री के विवाद को लेकर हुई. गिरफ्तार किए गए सभी संदिग्ध आरोपित वास्तव में नवरुणा के पिता की संपत्ति से लाभान्वित होने वालों में शामिल हैं. इसी लोभ में सभी एक मत होकर साजिश रच कर इस घटना को अंजाम दिया.
ब्रह्मेश्वर मुखिया हत्याकांड (2012)
1 जून 2012 की अहले सुबह बिहार के आरा में भूचाल आ गया जब रणवीर सेना के संस्थापक ब्रम्हेश्वर मुखिया की आरा के कतिरा में हत्या कर दी गई थी .बिहार सरकार के गृह मंत्रालय को दो बार आग्रह करने के बाद सीबीआई ने समूचे बिहार में आग लगा देनेवाले इस हाइप्रोपाइल मामले की जांच शुरु की लेकिन अब तक ये मुखिया हत्याकांड रहस्य बना हुआ है. बिहार की राजनीति को हिलाकर रख देने वाले ब्रह्मेश्व मुखिया हत्याकांड की जांच भी सीबीआई कर रही है जो फिलहाल ठप्प पड़ा है.
रणवीर सेना के चर्चित संस्थापक ब्रह्मेश्वर सिंह उर्फ ‘मुखिया’ की आरा में 1 जून 2012 को हत्या कर दी गई थी. अहले सुबह करीब साढ़े चार बजे हुई हत्या के समय वह निहत्थे और अकेले थे. अपने घर के पास ही मार्निंग वॉक कर रहे थे.
गत साल जून में एक संदिग्ध नंद गोपाल पांडेय उर्फ फौजी की गिरफ्तारी के बाद यह उम्मीद जगी थी कि इस चर्चित हत्याकांड का अंततः खुलासा हो जाएगा. पर ऐसा नहीं हो सका.
उसके बाद गत दिसंबर में सी.बी.आई ने अखबारों में एक विज्ञापन देकर लोगों से यह अपील की कि वे इस हत्याकांड के बारे में सटीक सूचना दें. उन्हें दस लाख रुपए का इनाम दिया जाएगा.
ब्रह्मेश्वर मुखिया की कहानी लीक से हट कर रही है
कभी माओवादियों के बाद बिहार की सर्वाधिक ताकतवर निजी सेना रणवीर सेना ही थी. उसके सुप्रीमो रहे ‘मुखिया’ के हत्यारे को खोज पाने में जांच एजेंसी की विफलता अनेक लोगों के लिए चिंता का कारण बनी हुई है.
साथ ही मुखिया के हत्यारे की चतुराई की भी चर्चा रही है जिन तक बिहार पुलिस कौन कहे सी.बी.आई तक नहीं पहुंच पा रही है.
याद रहे कि नब्बे के दशक में मध्य बिहार के एक बड़े इलाके में रणवीर सेना और लाल सेना के दस्तों के बीच भीषण खूनी खेल चल रहे थे. एक पर एक बड़े-बड़े नरसंहार और काउंटर नरसंहार हो रहे थे. पर समय के साथ हिंसा कम होती चली गई.
सन् 2005 में नीतीश कुमार के सत्ता में आने के बाद तरह-तरह के हिंसक तत्वों के खिलाफ मुकदमों की पुलिस ने अदालतों में त्वरित सुनवाई करवाई. कुछ ही वर्षों में करीब 75 हजार लोगों को सजाएं मिलीं.
आर्म्स एक्ट की दफा को अन्य दफाओं से अलग करके मुकदमे की सुनवाई करवाने का अधिक कारगर असर हुआ था.दरअसल आर्म्स एक्ट के मामले में गवाह पुलिस होती है. वह अपना बयान नहीं बदल सकती.परिणामस्वरूप सजाएं अधिक हुईं. नतीजतन तब हर तरह की हिंसा कम हुई थी.
रणवीर सेना और अतिवादी कम्युनिस्ट दस्तों के बीच भीषण खूनी टकराव के दौर में तो मुखिया का तो बाल बांका नहीं हुआ था, पर जब उन्होंने अहिंसक तरीके से किसानों को संगठित करने का संकल्प लिया तो उनकी हत्या हो गई. याद रहे कि खुद मुखिया पर हिंसा के 22 मुकदमे थे. अपनी हत्या के पहले ही उन में से 16 मुकदमों में वे बरी हो चुके थे.
7 मई 2012 को 67 वर्षीय ब्रह्मेश्वर मुखिया ने किसानों और मजदूरों को संगठित करने का संकल्प लेते हुए कहा था कि उन्हें संगठित करके हम किसानों के हितों की ओर सरकार का ध्यान खींचने के लिए अहिंसक आंदोलन चलाएंगे.
इस संकल्प के एक माह के भीतर ही उनकी हत्या कर दी गई. अब तक मिले संकेतों के अनुसार उनकी हत्या में अतिवादी कम्युनिस्टों के हाथ होने का कोई संकेत नहीं मिले हैं.
एक खबर आई थी कि वह अपने आवास के आसपास के दबंगों और उत्पाती तत्वों के खिलाफ खुद ही भिड़ जाते थे. दूसरी खबर यह भी आई थी कि रणवीर सेना के दूसरे गुट के कुछ लोग मुखिया की कथित राजनीतिक महत्वाकांक्षा को लेकर उनसे खार खाए बैठे थे. क्या कोई अन्य कारण थे ?
हत्या के पीछे असली कारण क्या थे, इसका पता तभी चलेगा जब सी.बी.आई असली हत्यारे तक पहुंचेगी.
उनकी हत्या के बाद जदयू के तत्कालीन सांसद डा.जगदीश शर्मा ने मुखिया को ‘अवतारी पुरूष’ बताया था. एक अन्य नेता ने उन्हें गांधीवादी कहा था. मुखिया की जघन्य हत्या से उनके समर्थकों और प्रशंसकों में तत्काल उपजे भारी गुस्से का नतीजा यह हुआ था कि कई घंटों तक आरा और पटना के बड़े हिस्से में सड़कों पर अराजकता व्याप्त हो गई थी.
उनकी शव यात्रा में शामिल गुस्साई भीड़ ने आरा और पटना में भारी तोड़फोड़ की. पुलिस मूक दर्शक बनी रही. पुलिस ने कहा कि यदि बल प्रयोग किया जाता तो पूरे राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ जाती. पर उस उत्तेजित भीड़ में शामिल लोगों में से भी कोई व्यक्ति अब तक मुखिया के असली हत्यारे तक पहुंचने में जांच एजेंसी की मदद नहीं कर सका है.
जमुई मूर्ति चोरी कांड (2015): जब बिहार पुलिस सीबीआई पर भारी पड़ी 
2015 में बिहार के जमुई से भगवान महावीर की प्राचीन मूर्ति चोरी हुई. इस मामले की जांच सीबीआई ने शुरु की लेकिन मामला अंजाम तक नहीं पहुंच सका है. इस मामले में बिहार पुलिस, सीबीआई से तेज निकली है.
बिहार के जमुई जिले से चोरी हुई भगवान महावीर की 2600 साल पुरानी ऐतिहासिक मूर्ति मिल गई है. करोड़ों रुपये की कीमत वाली यह मूर्ति शनिवार देर रात सिकंदरा थाना क्षेत्र के पतंबर गांव के पास सड़क किनारे पड़ी मिली. यह मूर्ति 27 नवंबर को चोरी हो गई थी.
सरकार ने CBI को सौंपी थी जांच
राज्य सरकार ने इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी थी. गृह मंत्री राजनाथ सिंह तक ने इस मामले में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से बात की थी. कुछ हथियारबंद लुटेरों ने यह मूर्ति पटना से 170 किलोमीटर दूर जमुई जिले के सिकंदरा मंदिर से लूट ली थी. हालांकि लुटेरे अभी पुलिस के हत्थे नहीं चढ़े हैं.
ऐसे मिली मूर्ति 
सूत्रों के मुताबिक कुछ गांव वाले जंगल की तरफ से आ रहे थे. तभी उनकी नजर झाड़ी में पड़ी इस मूर्ति पर पड़ी. गांव वालों ने इसकी सूचना जैन मंदिर और पुलिस को दी. इसके बाद पुलिस ने मूर्ति बरामद कर ली. चोरी की घटना को लेकर स्थानीय लोगों में काफी रोष भी था, जो एकाएक खुशी में बदल गया.
राजदेव रंजन हत्याकांड 2015
तीन साल पहले बिहार के सीवान में एक अखबार के ब्यूरो चीफ राजदेव रंजन की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. इस केस की जांच का जिम्मा भी सीबीआई को मिला है लेकिन मामले का खुलासा अभी तक नहीं हो सका है. इस केस की आंच बिहार के कई सफेदपोशों पर भी आयी है और केस  में चार्जशीट जरूर फाइल हुई है लेकिन हत्या के कारणों का अब तक खुलासा नहीं हो सका है.
निखिल प्रियदर्शी सेक्स रैकेट काण्ड (2017):
2017 में हुए इस सेक्स रैकेट के भंडाफोड़ की कहानी कुछ अलग है. इस पूरे जाल में फंसी लड़की बिहार सरकार में एक पूर्व मंत्री संजीव टोनी की बेटी थी. पटना के एक नामी हाई स्कूल में पढ़ी लड़की को इस बात का भरोसा था कि उसे अपनापन दिखाने वाला लड़का निखिल जल्द ही उसके साथ सात फेरे लेगा. साथ जीने-मरने की बात करने वाले दोनों की तरफ से अपने दोस्तों के बीच इस बात का ऐलान भी होने लगा था कि जल्द ही उनकी वेडिंग सेरेमनी भी होगी.
लेकिन, बाद में लड़की को इस बात का शक हुआ कि कुछ न कुछ गड़बड़ है. तब तक काफी देर हो चुकी थी. लड़की सेक्स रैकेट के दलदल में फंस चुकी थी. आरोपी कांग्रेस नेता के ऊपर भी पीड़ित लड़की की तरफ से बड़े संगीन आरोप लगे हैं. लेकिन कांग्रेसी नेता के अलावा भी कई रसूखदार लोगों ने इस लड़की का शारीरिक शोषण किया. काफी छटपटाहट के साथ लड़की इस दलदल से निकलने की कोशिश करती रही.
सेक्स रैकेट के इस खेल में फंसी पीड़ित लड़की निखिल प्रियदर्शी को लेकर अब अपने राज उगल रही है, जिससे देखकर साफ नजर आता है कि अगर साफगोई से इसकी जांच की जाए तो इस रैकेट में शामिल और कई सारे लोगों के नाम सामने आ पाएगा.
इस सेक्स कांड के सूत्रधारों के बारे में चर्चा इस बात की होती है कि इन्हें कई दूसरे बड़े नेताओं का संरक्षण हासिल है, जो अबतक इस पूरे खेल में शामिल रहे. बहुचर्चित शिल्पी-गौतम हत्या कांड में भी इस तरह के लोगों का नाम सामने आया था. लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट से साफ हुआ था कि शिल्पी गौतम की हत्या से पहले उसके साथ रेप हुआ था.
निखिल की तरफ से एक पत्रकार को तो यहां तक बताया गया कि ‘ मेरे पॉकेट में खुफिया कैमरे से shoot किये गये 55 ऐसे लोगों के वीडियो क्लिपिंग्स हैं जिसको मैं सार्वजनिक कर दूं तो कई धाकड़ नेताओं और सीनियर अधिकारियों की वाट लग जाएगी’.
मुजफ्फरपुर शेल्टर होम की 42 बच्चियों के साथ क्या होगा? क्या उन्हें न्याय मिलेगा? क्या ब्रजेश ठाकुर को उसके किये की सजा मिलेगी? क्या ब्रजेश ठाकुर के सरपरस्त नेताओं और अधिकारियों का सफेदपोश चेहरा बेनकाब होगा? तमाम सवाल बिहार वासियों के मन में उमड़ घुमड़ रहे हैं. फिलहाल जांच चल रही है. पर बिहार वासी एनजीओ, राजनीति, सेक्स के इस घिनौने खेल में न्याय की उम्मीद लगाए बैठे हैं

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