पद्मभूषण चंदा कोचर निकली फ्राड धंधा कोचर 3250 करोड़ ICICI बैंक का खेल

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पद्मभूषण चंदा कोचर का फ्राड अब सार्वजनिक हो गया है।चंदा कोचर बैंकिंग क्षेत्र का वैसा ही नाम था जैसा इंफोटेक क्षेत्र में सत्यम कंप्यूटर्स के मालिक बी रामालिंगा राजू। दोनों में एक और समानता है। दोनों ही अपने क्षेत्र मे शीर्ष पर होने के बावजूद घपले और घोटालों में लिप्त पाए गए। वे फोर्ब्स और फार्च्यून पत्रिकाओं द्वारा सालाना बनाई जाने वाली विश्व की 100 सबसे शक्तिशाली महिलाओं की सूची में कई सालों तक शामिल होती रही हैं।
देश के किसी बैंक की पहली महिला सीईओ बनने वाली चंदा राजस्थान के जोधपुर से हैं। 2009 में 48 साल की चंदा किसी बैंक की सबसे युवा सीईओ थीं। उन्होंने बीकॉम के बाद कॉस्ट अकाउंटेंसी में कोर्स किया और मुंबई के जमनालाल बजाज इंस्टीट्यूट से एमबीए। 1984 में चंदा कोचर ने आईसीआईसीआई बैंक बतौर मैनेजमेंट ट्रेनी ज्वाइन किया था। धीरे-धीरे तरक्की करती हुई वे 2009 में इसी बैंक की प्रबंध निदेशक और सीईओ बनीं। उनके कार्यकाल में इस बैंक ने बहुत तरक्की की और कई नए क्षेत्रों में विस्तार किया।
आईसीआईसीआई बैंक के महत्वाकांक्षी डिजिटल ग्राम कार्यक्रम को 20 राज्यों के 11000 गांवो तक पहुंचाने का श्रेय चंदा को ही है। उन्होंने ही आईसीआईसीआई बैंक को बीमा क्षेत्र में न सिर्फ प्रवेश कराया बल्कि प्रूडेंशियल और लोंबार्ड जैसी विदेशी कंपनियों के साथ साझेदारी कर सफलता की नई ऊंचाइयों को छुआ।
उनके नेतृत्व में ही आईसीआईसीआई बैंक देश का दूसरा सबसे बड़ा निजी बैंक बना। उन्हें देश के ही नहीं बल्कि विदेशों के भी कई सम्मानों से नवाजा गया है। उन्हें 2011 में राष्ट्रपति के हाथों देश का दूसरा सबसे बड़ा राष्ट्रीय सम्मान पद्मभूषण दिया गया। लेकिन एक भूल ने उन्हें राष्ट्र के गौरव के पद से उतार कर अपराधियों की श्रेणी में ला खड़ा किया है।
सीबीआई के अनुसार यह आईसीआईसीआई बैंक द्वारा वीडियोकॉन के मालिक वेणुगोपाल धूत को कर्ज देने के बदले बैंक की तत्कालीन सीईओ चंदा कोचर द्वारा घूस लेने का मामला है। घूस की रकम चंदा के पति दीपक कोचर की कंपनी न्यूपावर के खाते में जमा कराई जाती थी। हर बार जितनी राशि का कर्ज चंदा कोचर ने आईसीआईसीआई बैंक से वीडियोकॉन को स्वीकृत किया, उसकी दस प्रतिशत रकम वीडियोकॉन या उसकी सहयोगी कंपनियों द्वारा न्यूपावर के खाते में जमा करा दी जाती थी। सारा काम कई कंपनियों के एक ताल के माध्यम से हो रहा था ताकि जांच एजेंसियों की निगाह से बचा जा सके।
ऐसे चला कर्ज और कमीशन का खेल
दिसंबर 2008 – वेणुगोपाल धूत, दीपक कोचर और उनका भाई राजीव कोचर साझेदारी में न्यूपावर रीन्यूएबल्स प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी स्थापित करते हैं।चंदा कोचर 2009 में आईसीआईसीआई बैंक की सीईओ बनती हैं।जनवरी 2009 – धूत न्यूपावर के अपने 25000 शेयर ढाई लाख रुपये में दीपक कोचर को बेच देते हैं।जून 2009 – धूत न्यूपावर से अपना शेयर निकाल कर अपनी कंपनी सुप्रीम एनर्जी में डाल देते है। यानी साझेदारी खत्म।मार्च 2010 – धूत की सुप्रीम एनर्जी न्यूपावर को 64 करोड़ रुपये का कर्ज देती है।मार्च 2012 – धूत सुप्रीम एनर्जी के सारे शेयर दीपक कोचर के पिनेकल ट्रस्ट को नौ लाख रुपये में बेच देते हैं। यानी कोचर धूत से लिया  64 करोड़ का कर्ज मात्र नौ लाख रुपये में अदा कर देते हैं।अप्रैल 2012 – आईसीआईसीआई बैंक वीडियोकॉन समूह की पांच कंपनियों को 3250 करोड़ रुपये का कर्ज देता है।अप्रैल 2012 – टैक्स हैवेन माने जाने वाले मारीशस की कंपनी फर्स्टलैंड होल्डिंग्स कोचर की न्यूपावर में 325 करोड़ रूपया डालती है। यानी कर्ज की राशि की दस फीसदी।कर्ज की इस रकम में से 2810 रुपये यानी 86 प्रतिशत राशि आज तक अदा नहीं की गई है। बैंक ने 2017 में इसे एनपीए करार दे बट्टे खाते में डाल दिया।अप्रैल 2012 – आईसीआईसीआई बैंक वीडियोकॉन समूह की टैक्स हैवन माने जाने वाले केमैन द्वीप स्थित कंपनी को 660 करोड रुपये का कर्ज देती है।मॉरीशस स्थित डीएच रीन्यूएबल्स कोचर की न्यूपावर में 66 करोड़ रूपया डालती है। यानी कर्ज की राशि का दस फीसदी।